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Showing posts from May, 2022

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फारस का पारसी धर्म और उसका इतिहास क्या हैं?

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परिचय   पारसी पंथ अथवा जोरोएस्ट्रिनिइजम फारस का राजपंथ हुआ करता था। यह ज़न्द अवेस्ता नाम के ग्रन्थ पर आधारित है। इसके संस्थापक ज़रथुष्ट्र हैं , इसलिये इसे ज़रथुष्ट्री पंथ भी कहते हैं। जोरोएस्ट्रिनिइजम दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की संभावित जड़ों के साथ , पारसी धर्म 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लिखित इतिहास में प्रवेश करता है। यह लगभग 600 ईसा पूर्व से 650 सीई तक एक सहस्राब्दी से अधिक के लिए प्राचीन ईरानी साम्राज्यों के राज्य धर्म के रूप में कार्य करता था , लेकिन 633-654 के फारस की मुस्लिम विजय और पारसी लोगों के बाद के उत्पीड़न के बाद 7 वीं शताब्दी सीई से इसमें गिरावट आई। हाल के अनुमानों में पारसी की वर्तमान संख्या लगभग 110,000–120,000 है , जिसमें से अधिकांश भारत , ईरान और उत्तरी अमेरिका में रहते हैं ; माना जाता है कि उनकी संख्या घट रही है।   इतिहास ऐतिहासिक रूप से पारसी पंथ की शुरुआत 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुई। एक ज़माने में पारसी धर्म (जोरोएस्ट्रिनिइजम) ईरान का राजपंथ हुआ करता था। उन्होंने भारत मे...

शक वंश का इतिहास और भारत मे आक्रमण

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  शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था। शक मूलतः आर्य थे। इनकी सही नस्ल की पहचान करना कठिन रहा है क्योंकि प्राचीन भारतीय, ईरानी, यूनानी और चीनी स्रोत इनका अलग-अलग विवरण देते हैं। फिर भी अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि 'सभी शक स्किथी थे, लेकिन सभी स्किथी शक नहीं थे', यानि 'शक' स्किथी समुदाय के अन्दर के कुछ हिस्सों का जाति नाम था। स्किथी विश्व के भाग होने के नाते शक एक प्राचीन ईरानी भाषा-परिवार की बोली बोलते थे और इनका अन्य स्किथी-सरमती लोगों से सम्बन्ध था। शकों का भारत के इतिहास पर गहरा असर रहा है क्योंकि यह युएझ़ी लोगों के दबाव से भारतीय उपमहाद्वीप में घुस आये और उन्होंने यहाँ एक बड़ा साम्राज्य बनाया। आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर 'शक संवत' कहलाता है। बहुत से इतिहासकार इनके दक्षिण एशियाई साम्राज्य को 'शकास्तान' कहने लगे हैं, जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, सिंध, ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा और अफ़्ग़ानिस्तान शामिल थे। विवरण शक प्राचीन आर्यों के वैदिक कालीन सम्बन्धी रहे हैं जो शाकल द्वीप पर बसने के कारण शाक अ...

भारत पर हूणों का आक्रमण और उसका प्रभाव

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इस पोस्ट में जानने कि कोशिश करेंगे कि हूण कौन थे, ये कहाँ से आये और भारत पर इनके आक्रमण (Huna Invasion) से भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? हूण कौन थे? हूण मूलतः मध्य एशिया की एक जंगली और बर्बर जाति थे. जनसंख्या बढ़ जाने के कारण और कुछ अन्य कारणों से उनको मध्य एशिया छोड़कर भागना पड़ा. ये लोग दो  भागों में बंट गए. इनका एक दल वोल्गा नदी की ओर गया और दूसरा वक्षनद (आक्सस) की घाटी की ओर बढ़ा. जो दल वक्षनद की घाटी की ओर आया था, वह धीरे धीरे फारस में घुस गया. वहां से वे लोग अफगानिस्तान में आये और उन्होंने गांधार पर कब्ज़ा कर लिया. इसके बाद उन्होंने भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित शक और कुषाण राज्यों को नष्ट कर दिया. तत्पश्चात् इन लोगों ने भारत में प्रवेश किया. थोड़े ही समय में इन लोगों ने भारत के उत्तर-पश्चिम में अपना अधिकार कर लिया. भारत पर आक्रमण भारत पर हूणों का पहला आक्रमण 458 ई. में हुआ. उस समय गुप्त सम्राट कुमार गुप्त गद्दी पर था. उसने युवराज स्कन्दगुप्त को हूणों का सामना करने का उत्तरदायित्व सौंपा. स्कन्दगुप्त ने हूणों को बुरी तरह पराजित कर दिया. इसी ...

बर्लिन की दीवार क्यों बनाई गयी थी?

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    वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1954 से 1960 के दौरान पूर्वी जर्मनी के बहुत से महत्वपूर्ण लोग पश्चिमी जर्मनी चले गये थे. इस प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए 1961 में बर्लिन की दीवार को बनाया गया था. आइये इस लेख में जर्मनी की दीवार बनने की पूरी घटना के बारे में जानते हैं. बर्लिन की दीवार बनने का क्या कारण थे? पूर्वी जर्मनी में शिक्षा मुफ्त थी लेकिन पश्चिमी जर्मनी में शिक्षा पर खर्च करना पड़ता था; इस कारण जर्मन छात्र शिक्षा के लिए पूर्वी हिस्से में जाते और नौकरी के लिए पश्चिमी जर्मनी लौट आते थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब जर्मनी का विभाजन हो गया, तो सैंकड़ों कारीगर, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर और व्यवसायी प्रतिदिन पूर्वी बर्लिन को छोड़कर पश्चिमी बर्लिन जाने लगे. एक अनुमान के अनुसार 1954 से 1960 के दौरान 738 यूनिवर्सिटी प्रोफेसर,15, 885 अध्यापक, 4,600 डॉक्टर और 15,536 इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ पूर्व से पश्चिमी जर्मनी चले गए. कुल मिला कर यह संख्या 36,759 के लगभग है. लगभग 11 हजार छात्रों ने भी बेहतर भविष्य की तलाश में पूर्वी जर्मनी छोड़कर पश्चिमी जर्मनी चले गए. जितने लोगों ...