फारस का पारसी धर्म और उसका इतिहास क्या हैं?
परिचय
पारसी पंथ अथवा जोरोएस्ट्रिनिइजम फारस का राजपंथ हुआ करता था। यह ज़न्द अवेस्ता नाम के ग्रन्थ पर आधारित है। इसके संस्थापक ज़रथुष्ट्र हैं, इसलिये इसे ज़रथुष्ट्री पंथ भी कहते हैं। जोरोएस्ट्रिनिइजम दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की संभावित जड़ों के साथ, पारसी धर्म 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लिखित इतिहास में प्रवेश करता है। यह लगभग 600 ईसा पूर्व से 650 सीई तक एक सहस्राब्दी से अधिक के लिए प्राचीन ईरानी साम्राज्यों के राज्य धर्म के रूप में कार्य करता था, लेकिन 633-654 के फारस की मुस्लिम विजय और पारसी लोगों के बाद के उत्पीड़न के बाद 7 वीं शताब्दी सीई से इसमें गिरावट आई। हाल के अनुमानों में पारसी की वर्तमान संख्या लगभग 110,000–120,000 है, जिसमें से अधिकांश भारत, ईरान और उत्तरी अमेरिका में रहते हैं; माना जाता है कि उनकी संख्या घट रही है।
इतिहास
ऐतिहासिक रूप से पारसी पंथ की शुरुआत 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुई। एक ज़माने में पारसी धर्म (जोरोएस्ट्रिनिइजम) ईरान का राजपंथ हुआ करता था। उन्होंने भारत में शरण ली। तब से आज तक पारसियों ने भारत के उदय में बहुत बड़ा योगदान दिया है। ईरान पारसी देश हुआ करता था। फारसियों के इस्लाम ग्रहण करने के उपरांत समस्त ईरान को मुस्लिम देश बना दिया गया।
घटती जा रही है आबादी
लेकिन पारसी समुदाय के
सामने अब ये समस्या मुंह बाए खड़ी है कि घटती जनसंख्या के साथ साथ अपने धर्म और संस्कृति को कैसे
बचाया जाए. मुम्बई में पारसी समुदाय के लिए
पारसीआना नाम की पत्रिका के संपादक जहांगीर पटेल कहते हैं, "जनसंख्या के लिहाज से आप ज्यादा कुछ
नहीं कर सकते. ये कम होते होते एक दिन
गायब
ही हो जाएगी."
जरथुश्ट्र
संप्रदाय के लोग एक ईश्वर को मानते
हैं
जो 'आहुरा माज्दा' कहलाते हैं. ये लोग प्राचीन पैगंबर
जरथुश्ट्र की शिक्षाओं को मानते
हैं. पारसी लोग आग को ईश्वर की शुद्धता का प्रतीक मानते हैं और इसीलिए आग की पूजा करते हैं. वे
ईरान, अमेरिका और ब्रिटेन
जैसे बहुत से देशों में फैले
हुए हैं. दुनिया भर में इनकी औसत संख्या 2004
से
2012 के बीच 10 प्रतिशत से भी ज्यादा गिर कर 112,000 से भी कम रह गई है.
फारस से क्यों निकलने को मजबूर हुए पारसी ?
फारस में पारसियों के लिए पहले की तरह अपना ज़रथुस्ट्र पंथ या जीवन जीने के लिए मजदायासना और अपनी जिंदगी दोनों को सुरक्षित रखना जरूरी था। लेकिन, वे इस्लामिक कट्टरपंथियों के हमले के शिकार होने लगे थे। इस्लाम के उदय के साथ फारस में पहले की तरह उनका रहना नामुमकिन हो गया था। मुसलमानों के पहले खलीफा अबु बकर ने अपने एक कमांडर खालिद इब्न वालिद को पारसियों के पास यह औफर देकर भेजा,'इस्लाम कबूल कर लो और सुरक्षित रहो। या जजिया चुकाओ और तुम और तुम्हारे लोग हमारे संरक्षण में आ जाओ, नहीं तो जो भी होगा उसके लिए तुम खुद दोषी होगे, और जहां तक मेरी बात है तो ऐसे लोगों को लाता हूं जो उसी तरह मौत चाहते हैं, जैसे तुम जिंदगी चाहते हो।' उम्मयद खलीफा के वर्चस्व के समय में अगले दो दशकों में ही हजारों पारसियों को काट दिया गया या फांसी दे दी गई। जब अरब कमांडर साद इब्न वकास ने फारस की राजधानी पर कब्जा किया तो सभी गैर-इस्लामी किताबें, पुस्तकालय जला डाले गए और फारस (ईरान) एक इस्लामिक राज्य बन गया और वहां शरिया कानून लागू हो गया।
गुजरात के हिंदू राजा ने शरण दिया था
आखिरकार हजारों पारसियों ने बिना कुछ तैयारियों के नावों में बैठकर समंदर के रास्ते भारत की ओर कूच करना शुरू कर दिया। वह फारस से चलकर सीधे गुजरात के एक तटीय शहर संजान पहुंचने लगे। पारसियों का पहला जत्था 17 नवंबर को संजान पहुंचा था, इसलिए उस तारीख को वे संजान दिवस मनाते हैं। उस समय के स्थानीय हिंदू राजा जादी राणा या जदेजा ने करीब 18,000 पारसियों को अपने राज्य में शरण दिया और उन्हें अपना धर्म और अपनी परंपरा के पालन की इजाजत दी। एक महाकाव्य किस्सा-इ-सांजन में पारसियों या ईरानियों के भारत में शरण लेने के बारे में विस्तार से उल्लेख है। अनुमान के मुताबिक पारसी 8वीं से 10वीं सदी के बीच भारत आए थे, जो हमेशा के लिए उनका नया घर और मातृभूमि बन गया। बाद में पारसी समुदाय के लोग देश के ही कई शहरों (भारत और पाकिस्तान) में बस गए। इनमें मुंबई, सूरत और कराची जैसे शहर प्रमुख हैं। इस वक्त दुनियाभर में पारसियों की कुल आबादी करीब 26 लाख है, जिनमें से काफी संख्या में खुशनसीब भारतीय नागरिक हैं।

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